Saturday, July 08, 2017





आज का पूंजीवाद हमें अतीत के लिए रोते-बिसूरते हुए वर्तमान में निरुपाय जीने के लिए प्रशिक्षित करता है । भविष्य-स्वप्नों की जगह यदि अतीत की पुकार छेंके रहती है , तो अभिशप्त वर्तमान से बाहर निकलने की , उससे लड़ने की कोई राह नहीं सूझती । अतीत की ज़मीन पर खड़े होकर वर्तमान की विभीषिकाओं से नहीं लड़ा जा सकता ।
जैसे , प्राक-पूंजीवादी लोक-जीवन की रागात्मकता पूंजीवादी समाज के दमघोंटू एलियनेशन से बचाने का शरण्य नहीं हो सकती । याद रखना होगा कि वह पुरानी रागात्मकता भी औरतों , दलितों और गरीबों के लिए कितनी दमघोंटू थी ! पूंजीवादी समाज के कहर से बचने के लिए हमें आगे भविष्य की ओर देखना होगा और भविष्य की उस परियोजना को साकार करने के सैद्धान्तिक-व्यावहारिक रास्तों के बारे में सोचना ही होगा जब समस्त भौतिक प्रगति का लक्ष्य मुनाफा न होकर सार्वजनीन हित होगा ।
 

इतिहास की स्वाभाविक गति से , कुछ चीज़ें हमारे जीवन से हटकर संग्रहालयों में पहुँच जाती हैं और कुछ मूल्य-मान्यताएँ-संस्थाएं स्मृतियों के कबाड़ख़ाने में । काठ के हल , तसला-बटुली-ओखल-दातुन , छोटे मलिकाने की खेती , पुराने लोकगीत --- इन सबके लिए शोकगीत गाना निरर्थक है । उत्पादक शक्तियों का निरंतर विकास होता रहता है । पूंजीवाद के नाम पर आप आधुनिकता या आधुनिक चीजों का ही विरोध नहीं कर सकते । दूसरी बात , समाज का पूंजीवादीकरण चाहे जितना विनाशकारी हो , आप घड़ी की सुई को रोके नहीं रख सकते । हमें नास्टेल्जिया में जीने की जगह आगे एक नए भविष्य के निर्माण के बारे में सोचना होगा।
 

आज हम जिस फासीवादी विभीषिका के रूबरू हैं , उसका सामना पूंजीवादी जनवाद की ज़मीन पर खड़ा होकर नहीं किया जा सकता । धार्मिक यूटोपिया वाले गांधीवादी मानवतावाद और नेहरूकालीन 'कल्याणकारी राज्य' और मिश्रित अर्थ-व्यवस्था वाले गुजरे दिनों को वापस नहीं लाया जा सकता । उसी विकलांग-विकृत बुर्जुआ जनवाद के क्षरण-विघटन-पतन के बाद समाज में फासीवादी वर्चस्व की ज़मीन तैयार हुई है । उस बुर्जुआ जनवाद की जगह सर्वहारा जनवाद की ज़मीन पर खड़े होकर ही फासीवाद का मुक़ाबला किया जा सकता है ।

Wednesday, May 24, 2017

विद्वत्तापूर्ण , सुंदर भ्रमों और झूठों के विरोध में सीधे-सादे सच की अनगढ़-फूहड़ कविता

बुनियादी बातों पर विद्वानों में 
परस्पर सहमति हुआ करती थी
और गौण बातों पर ढेरों असहमतियाँ 
जिनपर लंबी बहसें हुआ करती थीं ।
उनके विचारों के बीच सदा होता था शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व ,
निरंतर जारी रहती थी शांतिपूर्ण प्रतिस्पर्धा
और वे एक-दूसरे में शांतिपूर्ण संक्रमण कर जाते थे
क्योंकि नए विचारों में संक्रमण की सभी संभावनाएं
समाप्त हो चुकी थीं ,
और दुनिया में हो चुके और होने वाले सभी बदलावों का
लेखा-जोखा लिया जा चुका था
-- इस ऐतिहासिक आकलन पर
सभी विद्वान एकमत थे ।
नए विचार अब मात्र शब्दों के कुछ समुच्चय ही हो सकते हैं
इस उत्तर-आधुनिक समय में ।
सृष्टि की शुरुआत हुई थी शब्द से
और अंत भी होगा शब्द पर
--- बहुचर्चित , बहुपुरस्कृत , बहुलांश विद्वानों का
ऐसा ही मानना था ।
लेकिन क्लाइमेक्स अभी बाकी था ।
अब सामने आया इस दुनिया का अंतिम यह विचार
कि सत्य की मृत्यु हो चुकी है उत्तर-सत्य के जन्म के बाद
और वस्तुगत यथार्थ से उत्तर-सत्य का कोई नाता नहीं होता ।
उत्तर-सत्य के युग में वस्तुपरकता एक विभ्रम है
और यथार्थ एक मिथक ।
लेकिन सभी विद्वान खाते-पीते, हगते-मूतते
और सत्ता द्वारा पुरस्कृत होते रहे
उतने ही वस्तुगत यथार्थ के तरीके से
जैसे पूंजी निचोड़ती रही अहर्निश उन उजरती गुलामों को
जो उनकी सुख-सुविधा के सारे सरंजाम बनाते थे ।
और यह दुनिया ऐसे ही नहीं बनी रहेगी अनंत काल तक ---
यह विचार अभी भी उतना ही बड़ा वस्तुगत यथार्थ
बना हुआ था , जितना 1848 में ,
1871 में , 1917 में , या 1949 में हुआ करता था ,
या उससे भी पहले हुआ करता था ,
ऐसा उनका मानना था जो
विद्वानों की दुनिया से बहिष्कृत ,
वास्तविक दुनिया में निवास करते थे
और रोज़मर्रा की सरगर्मियों और जद्दोजहद में शामिल थे
और चीज़ों पर सोचने का माद्दा और विद्रोह करने की
कूव्वत रखते थे ।




और अब , अगर तुम बोलते हो , तुम्हें मरना होगा 
अगर चुप रहते हो , तुम्हें मरना होगा 
तो बोलो और बोलकर मरो । 
--ताहर जियात 
(प्रगतिशील अल्जीरियन कवि जिनकी एक इस्लामी कट्टरपंथी गुट ने1993 में हत्या कर दी)



जो कमज़ोर होते हैं वे लड़ते नहीं ।
जो उनसे अधिक मज़बूत होते हैं
वे लड़ सकते हैं घंटे भर के लिए ।
जो और अधिक मज़बूत होते हैं , वे फिर भी
लड़ सकते हैं कई वर्षों तक । 
सबसे अधिक मज़बूत लोग लड़ते हैं
अपनी पूरी ज़िंदगी ।
वही हैं जो अपरिहार्य होते हैं ।
-- बेर्टोल्ट ब्रेष्ट