Sunday, December 10, 2017

 
ज़िन्दगी हमारे सामने जो सवाल उपस्थित करती है, वे ठोस भौतिक यथार्थ से उपजे होते हैं I इन्हीं सवालों का हल ढूँढ़ने के लिए हम दार्शनिक अमूर्तन में जाते हैं I
दार्शनिक अमूर्तन हमें 'इंट्यूशन' से आगे एक 'हाइपोथीसिस' तक और समाधान की आम दिशा तक ले जाते हैं I फिर उस दिशा में हमें आगे बढ़ना होता है, ज़िन्दगी के ठोस यथार्थ की ज़मीन पर और बोध से निर्मित अपनी धारणा का सत्यापन और परिशोधन करना होता है I
दार्शनिक अमूर्तन निमित्त है, लक्ष्य नहीं -- साधन है, साध्य नहीं I जीवन का लक्ष्य अंततोगत्वा जीवन को बेहतर और सुन्दर बनाना ही हो सकता है I और यह काम कोई महानायक नहीं बल्कि जन समुदाय की सामूहिक मेधा करती है Iजो जीवन की बुनियादी शर्तों का निर्माण करते हैं, वही जीवन के भौतिक और आत्मिक सौंदर्य को निखारने की सृजनात्मक क्षमता रखते हैं I नायक और नेता, जो इसी समाज के बेटे और उन्नत तत्व होते हैं, वे उपरोक्त ऐतिहासिक-सामाजिक उद्यम में नेतृत्व देने का काम करते हैं I
प्रबुद्ध स्त्री
कल एक प्रबुद्ध स्त्री मिली I
उसका पति बहुत अधिक प्रबुद्ध था I

वह दुनिया को अपने पति के नज़रिए से देखती थी I


मुक्त स्त्री
कल एक मुक्त स्त्री मिली I
अपनी सभी व्यक्तिगत-सामाजिक जिम्मेदारियों-जवाबदेहियों से,सभी सामाजिक सरोकारों-प्रतिबद्धताओं से, सभी नैतिक उसूलों और वर्जनाओं से मुक्त I
और विचारों से भी पूरी तरह मुक्त I

गृहस्वामिनी स्त्री
वह दिखावे भर को नहीं, सचमुच की गृहस्वामिनी थी I
बाहर सड़कों-चौराहों पर, दूकानों में, बसों-ट्रेनों में, दफ़्तर में -- सभी जगह उसके दुश्मनों का साम्राज्य फैला था I
सुरक्षित तो उतनी नहीं थी, फिर भी अपने दुर्ग में वह अपने आपको काफी सुरक्षित महसूस करती थी I
शत्रु दल का एक अकेला व्यक्ति उसके दुर्ग में आ गया, भूलवश या किसी प्रलोभनवश या किसी विवशतावश I
फिर उसने उस शख्स से जमकर बदला लिया I रगड़ा, पछीटा, धोया, निचोड़ा, फटकारा और अलगनी पर पसार दिया I
अब वह अपने को इतना विजयी महसूस करती थी कि शत्रु की छवि में ढल गयी थी I

सरल स्त्री
उसने जीवन की जटिलताओं पर कभी ज्यादा सर नहीं खपाया I हर स्थिति को स्वीकार किया और हर बात पर नासमझी भरी भोली हँसी हँसती रही I
दरअसल, सरल हँसी उसका मुखौटा थी, उसका रक्षा कवच थी और शत्रु पर घात लगाने और हमला करने के लिए खोदी गयी खंदक थी I







प्रशासक स्त्री
रोज़ाना दफ़्तर में सैकड़ों मर्दों पर शासन करने के बाद जब वह घर लौटती थी तो पति से और अपनी बिल्ली से भरपूर प्यार करती थी I
फंतासी वाले रोमैंटिक मूड में वह पति से कहती थी,"तुम मुझे कुतिया की तरह पीटो और पालतू बनाओ I"
दफ़्तर में मर्दों को फटकारने और हुक्म देने में उसे यौनिक आनंदातिरेक जैसा कुछ महसूस होता था I वह यह भी जानती थी कि वे तमाम मर्द उसके बारे में कैसी कल्पनाएँ करते हैं और पीठ पीछे क्या बातें करते हैं !
वह अपने जीवन से संतुष्ट थी I अपनी उपलब्धियों पर गर्वित थी I
स्त्री दासता या स्त्री मुक्ति जैसे सवालों पर उसने कभी सोचा नहीं I
समाज के बारे में सोचने के बारे में वह सोच नहीं सकती थी I

आत्मा की गुप्तचरी करने वाली स्त्री
प्यार के अन्तरंग क्षणों में भी वह आत्मा की गुप्तचरी करती थी I
उसे इस क़दर इसका नशा-सा हो गया था कि वह प्यार, साहचर्य आदि के अन्तरंग अनुभव और सुख को भूल चुकी थी I
वह प्रतिशोध लेना चाहती थी और शिकार खुद हो रही थी I






प्रोफेसरों के बारे में चन्द बातें जिन्हें पढ़ना प्रोफेसरों के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है !





जब क्रांति की लहर आगे की ओर गतिमान होती है तो प्रोफ़ेसर लोग क्रांतिकारियों के व्यवहार और सिद्धांत से सीखते हैं I जब गतिरोध का समय होता है तो बहुतेरे क्रांतिकारी प्रोफेसरों से क्रांति के विज्ञान की शिक्षा लेने लगते हैं I
दुनिया का इतिहास बनाने वाले आम लोगों को आजतक प्रोफेसरों ने नहीं बल्कि क्रांतिकारियों ने नेतृत्व दिया है I
दुनिया का सारा ज्ञान उत्पादन और वर्ग-संघर्ष की प्रयोगशालाओं-कार्यशालाओं में पैदा हुआ है I प्रोफ़ेसर लोग तो उसकी मात्र व्याख्याएँ करते हैं, जो प्रायः अधूरी, आंशिक या विरूपित हुआ करती हैं I प्रोफ़ेसर लोग दुनिया के क्रांतिकारी प्रयोगों से पैदा हुए ज्ञान के आधार पर अपने नए-नए बेवकूफी भरे अमूर्त सिद्धांत गढ़ते हैं और उसी की रोटी खाते हैं I
बेशक प्रोफेसरों को भी ज़रूर पढ़ा जाना चाहिए, लेकिन भरपूर आलोचनात्मक सजगता के साथ I तभी उनकी अधूरी, एकांगी, मनोगतवादी व्याख्याओं से भी कुछ हासिल किया जा सकता है I प्रोफेसरों का लेखन प्रायः खंडन और आलोचना के लिए उकसाता है और इस प्रक्रिया में क्रांतिकारियों को अपनी समझ साफ़ करने में मदद मिलती है I
मार्क्सवाद के धुरंधर माने जाने वाले दुनिया के अधिकांश प्रोफ़ेसर शास्त्रीय मार्क्सवाद की प्रचलित शब्दावली का इस्तेमाल करने में अपनी हेठी समझते है, इसलिए वे अपनी नयी टर्मिनोलॉजी गढ़ते हैं और अपनी कहन-शैली अनूठी बनाते हैं जिससे कुछ नयेपन के चमत्कार का अहसास हो I
प्रोफ़ेसर लोग क्रांतियों के इतिहास-विषयक अपने ज्ञान से शासक वर्ग को यह बताने में बहुत अहम भूमिका निभाते हैं कि क्रांतियों को रोका कैसे जा सकता है ! इस काम में रिटायर्ड क्रांतिकारी उनका साथ बखूबी निभाते हैं I
प्रोफ़ेसर यदि क्रांति का साथ भी देता है तो उसकी पूरी रॉयल्टी वसूलता है I वह सांस्कृतिक-बौद्धिक जन-संगठनों में ऊँचे-ऊँचे पद चाहता है और कार्यकर्ताओं के मार्क्सवाद के क्लास लगाना चाहता है I समाजवाद यदि आ जाये तो प्रोफ़ेसर तभीतक उसका साथ देंगे जबतक उनके बुर्जुआ विशेषाधिकारों पर आंच न आये I जैसे ही उनकी विशेष सुविधाएँ छिनेंगी, तनख्वाहों और सभी नागरिक सुविधाओं में बराबरी लाने की शुरुआत होगी वैसे ही प्रोफ़ेसर लोग समाजवाद से असंतुष्ट और नाराज हो जायेंगे और उसे व्यक्तिगत स्वातंत्र्य-विरोधी, निरंकुश, सर्वसत्तावादी आदि-आदि घोषित करने लगेंगे I
प्रोफ़ेसर का हम लगभग एक रूपक के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं I यह बात अधिकांश उच्च-मध्य वर्गीय बुद्धिजीवियों के साथ लागू होती है I
भारत में जो भी थोड़े-बहुत जेनुइन विद्वान मार्क्सवादी प्रोफ़ेसर थे इतिहास, अर्थशास्त्र, साहित्य या समाज विज्ञान के अन्य क्षेत्रों में, जिनसे तमाम राजनीतिक-वैचारिक मत-भिन्नता के बावजूद कुछ सीखा जा सकता था, वे या तो दिवंगत हो चुके हैं या क़ब्र में पैर लटकाए हुए हैं I ये जो नए -नए नव-मार्क्सवादी, उत्तर-मार्क्सवादी, उत्तर-आधुनिकतावादी प्रोफेसरों की नयी पीढी खद्योत समान नीम अँधेरे और नीम उजाले में भकभका और भटक रही है, ये सभी समाज-विमुख, संघर्ष-विमुख, कायर, कैरियरवादी, अपढ़, कुपढ, मूर्ख और सत्ताधर्मी हैं I ज्यादातर मामलों में ये काहिल, विलासी, लम्पट और दारूकुट्टे भी हैं -- बौद्धिक अध्यवसाय और परिशुद्धता से पूर्णतः दूर I ये ख़तरनाक वायरस फ़ैलाने वाले गंदे जीव हैं जो बौद्धिक क्षेत्र के ज़हीन नौजवानों के बीच व्यक्तिवाद, कैरियरवाद, जन-विमुखता, कूपमंडूकता और 'विद्वत्तापूर्ण मूर्खता' की सांघातिक बीमारी फैला रहे हैं I

साइबर युग की फ़ासीवादी बर्बरता


उत्‍पादक शक्तियों के विकास के साथ ही साथ बर्बरता के स्‍वरूप में भी तब्‍दीली आती है। 1930 के दशक में यूरोप में फ़ासीवादियों ने अल्‍पसंख्‍यकों, कम्‍युनिस्‍टों, राजनीतिक व‍िरोधियों और मानवीय मूल्‍यों की बात करने वाले हर नागरिक के दिल में ख़ौफ़ व दहशत तथा उनके ख़‍िलाफ़ पूरे समाज में नफ़रत फैलाने के लिए कंसनट्रेशन कैम्‍प और गैस चैम्‍बर का सहारा लिया था। लेकिन आज 21वीं सदी के साइबर युग में फ़ासीवादियों को कंसनट्रेशन कैम्‍प और गैस चैम्‍बर के तामझाम की ज़रूरत नहीं है। उन्‍हें बड़े पैमाने पर दंगों और नरसंहार की भी ज़रूरत नहीं है। वे अब बस बर्बर ढंग से कुछ 'टार्गेटेड' हत्‍याएँ करके उनका वीडियो बनाकर उसे सोशल मीडिया, व्‍हाट्सएप और ब्‍लॉगों-वेबसाइटों के ज़रिये वायरल करके पूरे समाज में ख़ौफ़, दहशत और नफ़रत का माहौल बना सकते हैं। यही नहीं जिस तरह से कंसनट्रेशन कैम्‍प और गैस चैम्‍बर मुनाफ़ा कमाने के भी साधन थे उसी तरीके से ख़ौफ़, दहशत और नफ़रत फैलाने वाले वीडियो वायरल करने का कारोबार भी खूब फल-फूल रहा है जिसमें तमाम वेबसाइटें और मीडिया चैनल ज़बर्दस्‍त मुनाफ़ा कमा रहे हैं।
राजसमंद की वीभत्‍स घटना के बाद कुछ लोग अचम्भित हैं कि एक इंसान दूसरे इंसान के साथ इतनी वहशियाना हरकत कैसे कर सकता है। कुछ लोग इसका कारण हत्‍यारे के पागलपन भरे जुनून में ढूँढ रहे हैं तो कुछ इसके लिए हिन्‍दुत्‍व की विचारधारा को जिम्‍मेदार ठहरा रहे हैं। इसमें कोई शक़ नहीं कि तमाम फ़ासीवादी विचारधाराओं की तरह हिन्‍दुत्‍व की विचारधारा भी ऐसा पागलपन भरा जुनून पैदा करती है जिसकी परिणति इस क़‍िस्‍म के बर्बर कृत्‍यों में होती है। लेकिन हमें अगला सवाल भी पूछने का साहस होना चाहिए कि वो कौन सी परिस्थितियाँ हैं जो हिन्‍दुत्‍व की विचारधारा को खाद-पानी देने का काम कर रही हैं। जब हम इस सवाल का जवाब ढूँढने की दिशा में आगे बढ़ते हैं तो बरबस ही बेर्टोल्‍ट ब्रेष्‍ट की वो बात याद आती है - बर्बरता बर्बरता से नहीं पैदा होती, बल्कि उन व्‍यापारिक सौदों से पैदा होती है जिन्‍हें बिना बर्बरता के अंजाम देना सम्‍भव नहीं हो पाता। आज साइबर युग की बर्बरता से अचम्भित होने की बजाय हमें इस बर्बरता के पीछे छ‍िपे उन सम्‍पत्ति सम्‍बन्‍धों को समझने की ज़रूरत है जिनको क़ायम रखने के लिए ऐसी बर्बरता आवश्‍यक है। जो लोग आज की बर्बरता से वाकई व्‍यथित हैं उनको यह ज़रूर सोचना चाहिए कि क्‍या लोभ-लालच, मुनाफ़े और निजी सम्‍पत्ति पर टिकी पूँजीवादी व्‍यवस्‍था के रहते इस बर्बरता से छुटकारा पाया जा सकता है? निश्‍चय ही ऐसी तमाम बर्बरताओं को बढ़ावा देने के लिए मौजूदा सरकार और शासन कर रही पार्टी को जिम्‍मेदार ठहराया जाना चाहिए। लेकिन हमें इस पर भी सोचना चाहिए कि क्‍या मौजूदा सरकार को बदल देने मात्र से समाज के पोर-पोर में घुल चुकी नफ़रत ख़त्‍म हो जाएगी? क्‍या हमें इस बर्बरता की जड़ यानी समूचे पूँजीवादी निजाम को ही नेस्‍तनाबूद करने के बारे में नहीं सोचना चाहिए?
-- Anand Singh की लेखनी से

जादुई यथार्थवादी अति लघु कथा







जादुई यथार्थवादी अति लघु कथा - एक
'आपसे मिलकर खुशी हुई' -- उसने कहा | और वह सच कह रहा था !!



जादुई यथार्थवादी अति लघु कथा -- दो
वे पति-पत्नी थे I जीवन भर वे एक-दूसरे से प्यार करते रहे I



जादुई यथार्थवादी अति लघु कथा -- तीन
मौक़ा मिलने पर भी उसने बेवफ़ाई नहीं की I एकनिष्ठ प्यार करता रहा I



जादुई यथार्थवादी अति लघु कथा -- चार
उस स्त्री की सुन्दरता को उसने प्रशंसा और प्यार से देखा, उसे भोगने का ख़याल तक दिल में लाये बिना I



जादुई यथार्थवादी अति लघु कथा -- पाँच
एक देश के एक शहर के एक मोहल्ले में एक प्रबुद्ध नागरिक रहता था I वह हमेशा स्त्री-पुरुष के बीच बराबरी की बातें करता था Iऔर वह दिल से इसमें यकीन करता था और वाक़ई ऐसा चाहता था I



जादुई यथार्थवादी अति लघु कथा -- छः
एक दिन उसे पुराने दोस्तों की याद आयी I
एक दिन पार्क में खेलते बच्चों को देखते रहना उसे अच्छा लगा I
एक दिन उसे पत्नी से गपशप करने को दिल चाहा I
एक दिन उसे बुराइयां बुरी लगीं I
एक दिन उसने कहा,"बस, बहुत हुआ !"


जादुई यथार्थवादी अति लघु कथा -- सात
एक कवि-लेखक था, शायद हिन्दी का ही था I उसकी रचनाओं के कुछ पाठक और प्रशंसक भी थे I उसने न कभी किसी प्रकाशक की लल्लो-चप्पो की, न ही किसी आलोचक को पटाया I उसने कभी पुरस्कार-सम्मान की भी कामना नहीं की I दिल्ली में रहकर भी न कभी साहित्य अकादमी गया, न ज्ञानपीठ, न ही दरियागंज या IIC या IHC.



जादुई यथार्थवादी अति लघु कथा -- आठ
एक दिन एक ताकतवर आदमी से एक आम आदमी टकराया I उसने उससे कुछ औपचारिक बातें कीं I फिर दोनों अपनी राह चले गए I उस रात ताकतवर आदमी को दिल का दौरा पड़ा और वह मर गया I वजह चाहे जो भी हो लेकिन दिन में जब आम आदमी उससे बातें कर रहा था तो आँखों में आँखें डालकर बातें कर रहा था और उसके कंधे झुके हुए नहीं थे I



जादुई यथार्थवादी अति लघु कथा -- नौ
एक लोकतंत्र था जहां कोई आतंक नहीं था, पैसे का या लाठी-गोली का I वहाँ ईमानदारी से चुनाव होता था, ईमानदारी से बहुमत की सरकार बनाती थी, और पूरी सरकार ईमानदारी से जनता की सेवा करती थी I




जादुई यथार्थवादी अति लघु कथा -- दस
एक प्रोफ़ेसर मिले, विश्वख्यात मार्क्सवादी दार्शनिक I और वह जो बातें कर रहे थे, वे मेरी समझ में आ रही थीं I




जादुई यथार्थवादी अति लघु कथा -- ग्यारह
दो भक्त रास्ते से जा रहे थे I एक अक़ल से काम लेने की बात कर रहा था और दूसरा अमन-चैन की I



जादुई यथार्थवादी अति लघु कथा -- बारह
एक बार ऐसा हुआ कि भद्र नेकदिल नागरिकों के आग्रहों, मोमबत्ती जुलूसों, कविता-पाठों, ज्ञापनों, प्रतिवेदनों, याचिकाओं और तरह-तरह के प्रतीकात्मक विरोधों से फासिस्टों के दिल बदल गए I वे शांतिप्रिय, लोकतांत्रिक और सेकुलर हो गए I



जादुई यथार्थवादी अति लघु कथा -- तेरह
एक दिन सुबह एक प्रख्यात प्रगतिशील साहित्यकार जब सोकर उठा तो बेडरूम की दीवारों पर टंगे तमाम प्रशस्ति-पत्रों पर नज़र तक नहीं डाली I शेल्फ़ में सजी अपनी किताबों को भी नहीं देखा I न तो उसने अपने गुट के किसी लेखक-आलोचक को फोन मिलाया, न अकादमी अध्यक्ष को, न किसी प्रकाशक को I न उसने कोई खिन्नता प्रकट की, न असंतोष और न ही मूड बिगाड़ने के लिए पत्नी को या बच्चों को डांटा I चाय उसने बालकनी में पी, पत्नी-बच्चों के साथ और अखबार पढ़ते हुए यह फैसला लिया कि कल वह एक माह से हड़ताल कर रहे छंटनीशुदा मज़दूरों के साथ एकजुटता का इज़हार करने जायेगा I पत्नी से उसने रात भर आने वाली उसकी खांसी के बारे में चिंता प्रकट की, फिर कहा,"चलो, आज घर की सफ़ाई करते हैं और कुछ स्पेशल पकाते हैं I"



जादुई यथार्थवादी अति लघु कथा -- चौदह
एक दिन ऐसा हुआ कि फिर समाजवाद आ गया I तब मार्क्सवादी बुद्धिजीवियों-प्रोफेसरों-पत्रकारों आदि की एक विशाल सभा हुई I सभा में यह विचार हुआ कि अतीत में समाजवाद की पराजय और पूँजीवादी पुनर्स्थापना में चूंकि मानसिक श्रम और शारीरिक श्रम के बीच अन्तर्वैयक्तिक अन्तर से पैदा होने वाले बुर्जुआ अधिकारों की बहुत अहम भूमिका रही थी, अतः सभी बुद्धिजीवी अब कारखाना-मज़दूरों के बराबर ही पगार लेंगे और साथ ही अध्ययन-अध्यापन से समय निकालकर कुछ शारीरिक श्रम के काम भी करेंगे Iइस आशय का प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित हुआ और सभी ने इसे दिल से स्वीकार किया I



जादुई यथार्थवादी अति लघु कथा -- पन्द्रह
एक दिन राजधानी की सभी नारीवादी स्त्रियाँ एक विशाल सभागार में एकत्र हुईं I सभा में सर्वसम्मति से तय हुआ कि चूँकि मज़दूर स्त्रियों को ज्यादा विविध और बर्बर रूपों में पुरुष उत्पीडन का सामना करना पड़ता है और चूँकि उनका आर्थिक शोषण भी बहुत अधिक होता है, और चूँकि उनकी संख्या पढी-लिखी मध्यवर्गीय स्त्रियों से कई-कई गुनी अधिक है, इसलिए नारीवादी आन्दोलन में मज़दूर स्त्रियों की मांगों को प्राथमिकता दी जायेगी और सभी संगठनों में उन्हें शामिल करने के साथ ही महत्वपूर्ण पद भी दिए जायेंगे I सभा में काम वाली बाई और अन्य कामगारिनों के साथ एकदम बराबरी, बहनापा और न्याय का व्यवहार करने जैसे कई अन्य महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए I गगनभेदी करतल-ध्वनि के साथ सभा समाप्त हुई I




जादुई यथार्थवादी अति लघु कथा -- सोलह
एक दिन भारत के एक मार्क्सवादी धुरंधर विद्वान ने बिना किसी हिचक या लाज-शर्म के अपने मौलिक विचारों को अपनी मातृभाषा में लिखा और फिर कई सभाओं में उस विषय पर मातृभाषा में ही बोले I एक दिन और ऐसा हुआ कि अंग्रेज़ी नहीं जानने-समझने वाले बहुत सारे लोग बहुत सारे अंग्रेज़ीदां लोगों के बीच न तो कुंठित हुए, न ही शर्मिन्दा I



... और अब इस कड़ी की आख़िरी क़िस्त
जादुई यथार्थवादी अति लघु कथा -- सत्रह
एक दिन कविता कृष्णपल्लवी ने सभी फैसले सोच-समझ कर लिए I
एक दिन उसे अपने किसी फ़ैसले के लिए पछताना नहीं पड़ा I
एक दिन उसने कोई भूल-ग़लती नहीं की I
एक दिन उसे उसके दुश्मनों ने बख्श दिया और शुभचिंतकों ने भी I
#जादू_जंगल